कुछ को कहते सुना तेरा अतीत ख़राब था,
मैं कहता हूँ उन्हें
अगर मेरा अतीत ख़राब नहीं होता,
पागलों स न भटकता, न घूमता न जूझता
तो तू ही बता मेरे अजीज़  
वर्तमान में इतना तजुरबा कहाँ से आता......

मेरी छोड़ तू अपनी बता,
तुम तो हो बहुत शालीन, हो बहुत अच्छे

उम्र तो साथ बीती फिर क्यू रह गए पीछे.
पत्थर को भी तोर कर जो शीशा चमकता हैं,
उसी शीशे की दुनिया हीरा समझाता हैं,

अफ़सुर्दा बैठे हैं हम आपसे मिलने के इंतजार में
और आप ये समझ बैठे मुझे वक्त बहुत हैं


अफ़सुर्दा= गुमसुम उदास 

वो रोते रही

वो रोते रही और हम सुनते रहे
वो सिसकती रही, हम पिघलते रहे,
हाय कैसी हैं किस्मत... रब तुम ही कहो
पास होकर भी हैं दूर कितने... ये तुम ही कहो
मेरे मौला ये तुमने सितम क्यू हैं ढाई
उनकी आँखों मे इतनी नमी क्यू हैं आई..
होता जो साथ उसके तो बुँदे निकलने न देता,
निकल भी अगर जाता तो गिरने न देता..
मगर मैं यूँ बैठा पागल न बनता
थाम बाँहों में उसको बस आंहे ही भरता..
सजा किस जनम की दिए जा रहे हो .....
मेरे खुदा बस मेरे जान लिए जा रहे हो ....
 

और वो पत्रकार हो गया.

और वो पत्रकार हो गया.

कोई शौख नहीं थी
शायद होगी मज़बूरी
हुआ होगा पेट पर अत्याचार....
और वो पत्रकार हो गया.

बस किया चापलूसी,
फेके हड्डी को खाया...
किया समाज का बलात्कार
और वो पत्रकार हो गया.

वेश्या से भी सस्ती
बनाया अपना हस्ती
बन्दुक का मिला साथ
और वो पत्रकार हो गया

चलो अच्छा हैं
जीते जी वो अपना काम कर गया
सबसे बड़े दलाल में अपना नाम कर गया...
आगे का जेनेरेशन भी कर रहा तैयार
देखो भाई अब पप्पू भी बन रहा पत्रकार..  

कैसे अब पहचानूँ मैं

किस किस का परित्याग करू मैं,
किस किस को अपनाऊ मैं....
हैं कौन यहाँ अपना कौन पराया
कैसे अब पहचानूँ मैं?????

कदम जब मेरे बढ़ते हैं,
बहुत अपनों के सीने जलते हैं,
लड़खड़ाते हैं जब मेरे कदम
अनजाने कन्धा देते हैं...

चेहरे पर लिए मुस्कराहट
वे हाथ में खंजर रखते हैं,
दिल अपना साफ़ रख कर
हम इमान से गले उनके मिलते हैं...

एक बार नहीं दो बार नहीं
हर बार हम छले जाते हैं,
हैं जूनून, हद पागलपन
फिर एक बार गले मिल आते हैं...

बढूँगा मैं
चलूँगा मैं,
बढ़ते ही चले जायेंगे ...
घबडाना मत...
तेरे खंजर में जंग न लगे
तुमको भी पास बुलाएँगे..
 

काश कि वो लौट के आयें मुझसे ये कहने;
कि तुम कौन होते हो मुझसे बिछड़ने वाले।
हीरों की बस्ती में हमने कांच ही कांच बटोरे हैं;
कितने लिखे फ़साने, फिर भी सारे कागज़ कोरे है।
तालीम नहीं दी जाती परिंदों को उड़ानों की;
वह तो खुद ही समझ जाते हैं ऊंचाई आसमानों की।
फ़ुर्सतें मिलें जब भी रंजिशें भुला देना;
कौन जाने सांसोंं की मोहलतें कहाँ तक है।
तुम्हारी मस्त नज़र अगर इधर नहीं होती;
नशे में चूर फ़िज़ा इस कदर नहीं होती;

पानी फेर दो इन पन्नों पर ताकि धुल जाए स्याही सारी मेरी;
ज़िन्दगी फिर से लिखने का मन होता है कभी-कभी।

बस यूँ ही



देखे हैं हमने भी ज़माने को यहीं
देखा हैं आँख मूंदते हुए अपनों को यहीं
हाँ अब थक गया हूँ मैं
खोजता हूँ बिस्तर की अब बस बहुत हुआ
अब और नहीं
बस सो जाऊ एसे की.. दुनिया भी हो न खफा
अपने तो अपने सही गैर भी कह सके न बेवफा
पर लगता हैं अब भी  कुछ बाकि है करने को ...
बुझते तो दीये भी हैं फिर जलने को.....
फिर तक़दीर मे हो लिखा गम ही सही...
आजमा लू उनको भी तो फिर हर्ज ही क्या ....
इस कश म कश मे डूबा तो एक नशा होगा ....
उनके भी लिस्ट मे नया कोई फनाह होगा.....
नादान हैं वो सोचेंगे  उनके आखों में बस डूबा हैं कोई  यूँही
उसे क्या पता ..
दिल में एक हसरत है उनके भी बसी ....
हाँ एक बार तो गुमा हो मुझे फिर..
जब जब टुटा हूँ मैं और भी निखरा हूँ मैं..... बस यूँ ही

वो थे न मुझसे दूर न मैं उनसे दूर था;
आता न था नज़र तो नज़र का कुसूर था।
तुम आओ कभी दस्तक तो दो दर-ए-दिल पर;
प्यार ज्यादा न दिया तो सज़ा-ए-मौत दे देना।
हुनर अब आ गया मुझको वफाओं को परखने का;
 दिखावे की हर एक चाहत मैं वापिस मोड़ देता हूँ।
अपने वजूद पर इतना तो यकीन है मुझको कि;
कोई दूर तो हो सकता है मुझसे पर भूल नहीं सकता।
दुश्मनों से मोहब्बत होने लगी है मुझे;
जैसे-जैसे दोस्तों को आज़माते जा रह हूं मैं...
यूँ ही रखते रहे बचपन से दिल साफ़ हम अपना;
पता नहीं था कि कीमत तो चेहरों की होती है दिल की नहीं..
कम से कम तन्हाई तो साथी है;
अपनी जिंदगी के हर एक पल की;
चलो ये शिकवा भी दूर हुआ कि;
किसी ने साथ नहीं दिया।

बस ........ जलाने के लिए

सूखे पत्तों की तरह बिखड़ा हुआ था मैं,
तुने समेटा भी तो बस ........
जलाने के लिए |