दरबारे-वतन में जब इक दिन सब जाने वाले जाएंगे......
कुछ अपनी सजा को पहुंचेंगे कुछ अपनी जजा (पारितोषिक) ले जाएंगे...
ऐ खाक नशीनो! (मिट्टी मे रहने वालों) उठ बैठो, वो वक्त करीब आ बैठा हैं...
जब तख़्त (सिंहासन) गिराए जाएंगे, जब ताज उछाले जाएंगे.....
अब दूर गिरेंगी जंजीरें, अब जिन्दानों (कारागारों) की खैर नहीं...
जब दरिया झूम के उठेंगे, तिनको से टाले जाएंगे....
कटते भी चलो बढ़ते भी चलो, बाजू भी बहुत हैं सर भी बहुत..
फैज़ अहमद फैज़