तो क्या गम है

मता -ए-लोहो-कलम छिन गई तो क्या गम है
कि खूने-दिल में डुबो ली हैं उँगलियाँ  मैंने

फैज़ अहमद फैज़

दरबारे-वतन में जब इक दिन सब जाने वाले जाएंगे......
कुछ अपनी सजा को पहुंचेंगे कुछ अपनी जजा (पारितोषिक) ले जाएंगे...
ऐ खाक नशीनो! (मिट्टी मे रहने वालों) उठ बैठो, वो वक्त करीब आ बैठा हैं...
जब तख़्त (सिंहासन) गिराए जाएंगे, जब ताज उछाले जाएंगे.....
अब दूर गिरेंगी जंजीरें, अब जिन्दानों (कारागारों) की खैर नहीं...
जब दरिया झूम के उठेंगे, तिनको से टाले जाएंगे....
कटते भी चलो बढ़ते भी चलो, बाजू भी बहुत हैं सर भी बहुत..

फैज़ अहमद फैज़

फैज़ अहमद फैज़

हैं लबरेज (भरी हुई) आहों से ठंढी हवाएं
उदासी में डूबी हुई हैं घटाएं
मुहब्बत के दुनिया पे शाम आ चुकी हैं
सियाह-पोश (अंधकार) हैं ज़िन्दगी की फ़जाए (वातावरण)
मचलती हैं सीने में लाख आर्जुए (अभिलाषा)
तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएं (प्राथनाएं)
तगाफुल (विमुखता) के आगोश में सो रहे हैं
तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएं
मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल
तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुवाएं

फैज़ अहमद फैज़