काश कि वो लौट के आयें मुझसे ये कहने;
कि तुम कौन होते हो मुझसे बिछड़ने वाले।
हीरों की बस्ती में हमने कांच ही कांच बटोरे हैं;
कितने लिखे फ़साने, फिर भी सारे कागज़ कोरे है।
तालीम नहीं दी जाती परिंदों को उड़ानों की;
वह तो खुद ही समझ जाते हैं ऊंचाई आसमानों की।
फ़ुर्सतें मिलें जब भी रंजिशें भुला देना;
कौन जाने सांसोंं की मोहलतें कहाँ तक है।
तुम्हारी मस्त नज़र अगर इधर नहीं होती;
नशे में चूर फ़िज़ा इस कदर नहीं होती;

पानी फेर दो इन पन्नों पर ताकि धुल जाए स्याही सारी मेरी;
ज़िन्दगी फिर से लिखने का मन होता है कभी-कभी।

बस यूँ ही



देखे हैं हमने भी ज़माने को यहीं
देखा हैं आँख मूंदते हुए अपनों को यहीं
हाँ अब थक गया हूँ मैं
खोजता हूँ बिस्तर की अब बस बहुत हुआ
अब और नहीं
बस सो जाऊ एसे की.. दुनिया भी हो न खफा
अपने तो अपने सही गैर भी कह सके न बेवफा
पर लगता हैं अब भी  कुछ बाकि है करने को ...
बुझते तो दीये भी हैं फिर जलने को.....
फिर तक़दीर मे हो लिखा गम ही सही...
आजमा लू उनको भी तो फिर हर्ज ही क्या ....
इस कश म कश मे डूबा तो एक नशा होगा ....
उनके भी लिस्ट मे नया कोई फनाह होगा.....
नादान हैं वो सोचेंगे  उनके आखों में बस डूबा हैं कोई  यूँही
उसे क्या पता ..
दिल में एक हसरत है उनके भी बसी ....
हाँ एक बार तो गुमा हो मुझे फिर..
जब जब टुटा हूँ मैं और भी निखरा हूँ मैं..... बस यूँ ही

वो थे न मुझसे दूर न मैं उनसे दूर था;
आता न था नज़र तो नज़र का कुसूर था।
तुम आओ कभी दस्तक तो दो दर-ए-दिल पर;
प्यार ज्यादा न दिया तो सज़ा-ए-मौत दे देना।