जुरुरत पड़ी तो तेरी याद याई

जुरुरत पड़ी तो तेरी याद याई, आज मुझे भी इबादत की याद आई

सुन्न पड़ चुकने के बाद ही सही, मगर तेरी तो याद आई....

बन के एक फरयादी आ गया तेरे दर पर अपने सर को झुका..

अब तू सुने या न सुने मुझे तेरे से कोई सिकवा नहीं....

सबने कहाँ तू मालिक हैं सबका

मैं एक पगला सा खड़ा सब पर यूँ हँसता रहा...

आज जब मैंने भी खाई हैं ठोकर..

सच कह रहा हूँ तब मैंने जाना तुझको..

अब तू मुझे अपना या ठुकरा दे तू मुझे...

गम बस एक बात का होगा की क्यू नहीं पहले तेरी याद आई