जब तारे जमीं पर आते हैं तब चाँद भी गर्दिश में मिल जाते हैं...
कुछ को कहते सुना तेरा अतीत ख़राब था,
मैं कहता हूँ उन्हें
अगर मेरा अतीत ख़राब नहीं होता,
पागलों स न भटकता, न घूमता न जूझता
तो तू ही बता मेरे अजीज़  
वर्तमान में इतना तजुरबा कहाँ से आता......

मेरी छोड़ तू अपनी बता,
तुम तो हो बहुत शालीन, हो बहुत अच्छे

उम्र तो साथ बीती फिर क्यू रह गए पीछे.
पत्थर को भी तोर कर जो शीशा चमकता हैं,
उसी शीशे की दुनिया हीरा समझाता हैं,

अफ़सुर्दा बैठे हैं हम आपसे मिलने के इंतजार में
और आप ये समझ बैठे मुझे वक्त बहुत हैं


अफ़सुर्दा= गुमसुम उदास 

वो रोते रही

वो रोते रही और हम सुनते रहे
वो सिसकती रही, हम पिघलते रहे,
हाय कैसी हैं किस्मत... रब तुम ही कहो
पास होकर भी हैं दूर कितने... ये तुम ही कहो
मेरे मौला ये तुमने सितम क्यू हैं ढाई
उनकी आँखों मे इतनी नमी क्यू हैं आई..
होता जो साथ उसके तो बुँदे निकलने न देता,
निकल भी अगर जाता तो गिरने न देता..
मगर मैं यूँ बैठा पागल न बनता
थाम बाँहों में उसको बस आंहे ही भरता..
सजा किस जनम की दिए जा रहे हो .....
मेरे खुदा बस मेरे जान लिए जा रहे हो ....
 

और वो पत्रकार हो गया.

और वो पत्रकार हो गया.

कोई शौख नहीं थी
शायद होगी मज़बूरी
हुआ होगा पेट पर अत्याचार....
और वो पत्रकार हो गया.

बस किया चापलूसी,
फेके हड्डी को खाया...
किया समाज का बलात्कार
और वो पत्रकार हो गया.

वेश्या से भी सस्ती
बनाया अपना हस्ती
बन्दुक का मिला साथ
और वो पत्रकार हो गया

चलो अच्छा हैं
जीते जी वो अपना काम कर गया
सबसे बड़े दलाल में अपना नाम कर गया...
आगे का जेनेरेशन भी कर रहा तैयार
देखो भाई अब पप्पू भी बन रहा पत्रकार..  

कैसे अब पहचानूँ मैं

किस किस का परित्याग करू मैं,
किस किस को अपनाऊ मैं....
हैं कौन यहाँ अपना कौन पराया
कैसे अब पहचानूँ मैं?????

कदम जब मेरे बढ़ते हैं,
बहुत अपनों के सीने जलते हैं,
लड़खड़ाते हैं जब मेरे कदम
अनजाने कन्धा देते हैं...

चेहरे पर लिए मुस्कराहट
वे हाथ में खंजर रखते हैं,
दिल अपना साफ़ रख कर
हम इमान से गले उनके मिलते हैं...

एक बार नहीं दो बार नहीं
हर बार हम छले जाते हैं,
हैं जूनून, हद पागलपन
फिर एक बार गले मिल आते हैं...

बढूँगा मैं
चलूँगा मैं,
बढ़ते ही चले जायेंगे ...
घबडाना मत...
तेरे खंजर में जंग न लगे
तुमको भी पास बुलाएँगे..