बस यूँ ही



देखे हैं हमने भी ज़माने को यहीं
देखा हैं आँख मूंदते हुए अपनों को यहीं
हाँ अब थक गया हूँ मैं
खोजता हूँ बिस्तर की अब बस बहुत हुआ
अब और नहीं
बस सो जाऊ एसे की.. दुनिया भी हो न खफा
अपने तो अपने सही गैर भी कह सके न बेवफा
पर लगता हैं अब भी  कुछ बाकि है करने को ...
बुझते तो दीये भी हैं फिर जलने को.....
फिर तक़दीर मे हो लिखा गम ही सही...
आजमा लू उनको भी तो फिर हर्ज ही क्या ....
इस कश म कश मे डूबा तो एक नशा होगा ....
उनके भी लिस्ट मे नया कोई फनाह होगा.....
नादान हैं वो सोचेंगे  उनके आखों में बस डूबा हैं कोई  यूँही
उसे क्या पता ..
दिल में एक हसरत है उनके भी बसी ....
हाँ एक बार तो गुमा हो मुझे फिर..
जब जब टुटा हूँ मैं और भी निखरा हूँ मैं..... बस यूँ ही