गुस्ताखी यहीं हैं हमारी

गुस्ताखी यहीं हैं हमारी,
की हर किसी से रिश्ता जोड़ जाते हैं.
लोग कहते हैं मेरा दिल पत्थर का हैं,
लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं यहाँ,
जो इसे भी तोड़ जाते हैं.


(मेरे फेसबुक मित्र गीता महाजन के वाल से)

नसीब

दीदार की 'तलब' हो तो नज़रे जमाये रखना 'ग़ालिब';
क्युकी, 'नकाब' हो या 'नसीब'... सरकता जरुर है।