बस यूँ ही



देखे हैं हमने भी ज़माने को यहीं
देखा हैं आँख मूंदते हुए अपनों को यहीं
हाँ अब थक गया हूँ मैं
खोजता हूँ बिस्तर की अब बस बहुत हुआ
अब और नहीं
बस सो जाऊ एसे की.. दुनिया भी हो न खफा
अपने तो अपने सही गैर भी कह सके न बेवफा
पर लगता हैं अब भी  कुछ बाकि है करने को ...
बुझते तो दीये भी हैं फिर जलने को.....
फिर तक़दीर मे हो लिखा गम ही सही...
आजमा लू उनको भी तो फिर हर्ज ही क्या ....
इस कश म कश मे डूबा तो एक नशा होगा ....
उनके भी लिस्ट मे नया कोई फनाह होगा.....
नादान हैं वो सोचेंगे  उनके आखों में बस डूबा हैं कोई  यूँही
उसे क्या पता ..
दिल में एक हसरत है उनके भी बसी ....
हाँ एक बार तो गुमा हो मुझे फिर..
जब जब टुटा हूँ मैं और भी निखरा हूँ मैं..... बस यूँ ही

वो थे न मुझसे दूर न मैं उनसे दूर था;
आता न था नज़र तो नज़र का कुसूर था।
तुम आओ कभी दस्तक तो दो दर-ए-दिल पर;
प्यार ज्यादा न दिया तो सज़ा-ए-मौत दे देना।
हुनर अब आ गया मुझको वफाओं को परखने का;
 दिखावे की हर एक चाहत मैं वापिस मोड़ देता हूँ।
अपने वजूद पर इतना तो यकीन है मुझको कि;
कोई दूर तो हो सकता है मुझसे पर भूल नहीं सकता।
दुश्मनों से मोहब्बत होने लगी है मुझे;
जैसे-जैसे दोस्तों को आज़माते जा रह हूं मैं...
यूँ ही रखते रहे बचपन से दिल साफ़ हम अपना;
पता नहीं था कि कीमत तो चेहरों की होती है दिल की नहीं..
कम से कम तन्हाई तो साथी है;
अपनी जिंदगी के हर एक पल की;
चलो ये शिकवा भी दूर हुआ कि;
किसी ने साथ नहीं दिया।

बस ........ जलाने के लिए

सूखे पत्तों की तरह बिखड़ा हुआ था मैं,
तुने समेटा भी तो बस ........
जलाने के लिए |

उनको भी हमसे मुहब्बत हो जरुरी तो नहीं

उनको भी हमसे मुहब्बत हो जरुरी तो नहीं
एक सी दोनों की हालत हो जरुरी तो नहीं.......

बदली बदली सी नजर आती हैं दुनिया हमको
इसमें उनकी भी इनायत हो जरुरी तो नहीं....

एक सी दोनों की हालत हो जरुरी तो नहीं.......
उनको भी हमसे मुहब्बत हो जरुरी तो नहीं

जिसको कहते हैं मुहबत हैं खुदा की निमत
सबकी किस्मत में ये दौलत हो जरुरी तो नहीं.....

एक सी दोनों की हालत हो जरुरी तो नहीं.......
उनको भी हमसे मुहब्बत हो जरुरी तो नहीं

चाँद छुने की तम्मना तो हैं हमको भी मगर
दूर का चाँद हकीकत हो जरुरी तो नहीं.....

उनको भी हमसे मुहब्बत हो जरुरी तो नहीं

तो मैं क्या करूँ......

मस्जिद तो बना दी सबभर (रात भर) में इमाम की हरारत वालों ने
मन अपना पुराना पापी हैं, बरसों में नमाजी बन ना सका, तो मैं क्या करूँ......

बेवफ़ा के नाम से बदनाम हुए हम..

एक खुशी के लिए हर खुशी से दूर हुए हम,
कुछ कह भी न सके उनको इतने मजबूर हुए हम.......
निभाने आई न उनको वफ़ा......
और बेवफ़ा के नाम से बदनाम हुए हम.......

बेवफ़ा

हाँ! मुझे रस्म-ए-मोहब्बत का सलीक़ा ही नहीं;
जा! किसी और का होने की इजाज़त है तुझे।

फिर से निकलेंगे तलाश-ए-ज़िंदगी में;
दुआ करना इस बार कोई बेवफ़ा ना मिले।

गुस्ताखी यहीं हैं हमारी

गुस्ताखी यहीं हैं हमारी,
की हर किसी से रिश्ता जोड़ जाते हैं.
लोग कहते हैं मेरा दिल पत्थर का हैं,
लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं यहाँ,
जो इसे भी तोड़ जाते हैं.


(मेरे फेसबुक मित्र गीता महाजन के वाल से)

नसीब

दीदार की 'तलब' हो तो नज़रे जमाये रखना 'ग़ालिब';
क्युकी, 'नकाब' हो या 'नसीब'... सरकता जरुर है।

गुरुर

कब्र की मिट्टी हाथ में लिए सोच रहा हूँ,
लोग मरते हैं तो गुरुर कहाँ जाता हैं!!!

 सूखे पत्तों की तरह बिखरे थे हम,
किसी ने समेटा भी तो सिर्फ जलाने के लिए..........

मैं तो आज को जीता हूँ

 जो बीत चूका हैं उसे मैं भूल चूका हूँ और
 जो आने वाला हैं उसकी मैं चिन्ता नहीं करता....
मैं तो आज को जीता हूँ और
आज में ही जीता मर जाऊंगा....

एक और सच

जीवन के विस्मित घडियों मे कौन किसी का होता हैं ...........
अपनी परछाई भी साथ न देती, अंधकार जब होता हैं..............

अगर रख सको तो एक निशानी हूँ मैं

अगर रख सको तो एक निशानी हूँ मैं,
खो दो तो सिर्फ एक कहानी हूँ मैं ,
रोक पाए न जिसको ये सारी दुनिया,
वोह एक बूँद आँख का पानी हूँ मैं.....
सबको प्यार देने की आदत है हमें,
अपनी अलग पहचान बनाने की आदत है हमे,
कितना भी गहरा जख्म दे कोई,
उतना ही ज्यादा मुस्कराने की आदत है हमें...
इस अजनबी दुनिया में अकेला ख्वाब हूँ मैं,
सवालो से खफा छोटा सा जवाब हूँ मैं,
जो समझ न सके मुझे, उनके लिए "कौन"
जो समझ गए उनके लिए खुली किताब हूँ मैं,
आँख से देखोगे तो खुश पाओगे,
दिल से पूछोगे तो दर्द का सैलाब हूँ मैं,,,,,
"अगर रख सको तो निशानी, खो दो तो सिर्फ एक कहानी हूँ मैं"....  अज्ञात 

जुरुरत पड़ी तो तेरी याद याई

जुरुरत पड़ी तो तेरी याद याई, आज मुझे भी इबादत की याद आई

सुन्न पड़ चुकने के बाद ही सही, मगर तेरी तो याद आई....

बन के एक फरयादी आ गया तेरे दर पर अपने सर को झुका..

अब तू सुने या न सुने मुझे तेरे से कोई सिकवा नहीं....

सबने कहाँ तू मालिक हैं सबका

मैं एक पगला सा खड़ा सब पर यूँ हँसता रहा...

आज जब मैंने भी खाई हैं ठोकर..

सच कह रहा हूँ तब मैंने जाना तुझको..

अब तू मुझे अपना या ठुकरा दे तू मुझे...

गम बस एक बात का होगा की क्यू नहीं पहले तेरी याद आई