कैसे अब पहचानूँ मैं

किस किस का परित्याग करू मैं,
किस किस को अपनाऊ मैं....
हैं कौन यहाँ अपना कौन पराया
कैसे अब पहचानूँ मैं?????

कदम जब मेरे बढ़ते हैं,
बहुत अपनों के सीने जलते हैं,
लड़खड़ाते हैं जब मेरे कदम
अनजाने कन्धा देते हैं...

चेहरे पर लिए मुस्कराहट
वे हाथ में खंजर रखते हैं,
दिल अपना साफ़ रख कर
हम इमान से गले उनके मिलते हैं...

एक बार नहीं दो बार नहीं
हर बार हम छले जाते हैं,
हैं जूनून, हद पागलपन
फिर एक बार गले मिल आते हैं...

बढूँगा मैं
चलूँगा मैं,
बढ़ते ही चले जायेंगे ...
घबडाना मत...
तेरे खंजर में जंग न लगे
तुमको भी पास बुलाएँगे..